Month: June 2023

  • ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स

    बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम

     

    महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल

    हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम

     

    बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं

    हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम

     

    ज़ोफ़ से है ने क़नाअत से ये तर्क-ए-जुस्तुजू

    हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम

     

    दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ ‘असद’

    जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम

     

    बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम

    मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम

     

    बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ’

    पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम

     

    मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल

    आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम

     

    फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में

    जूँ ज़बान-ए-शम्अ’ दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम

     

    शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से

    पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम

     

    हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए

    दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम

     

    कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं

    आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम

     

    वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ

    नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम

    ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब

    दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब

    दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब

    दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना

    बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ

     

    हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम

    महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ

     

    है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ

    अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ

     

    है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ

    नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद या

     

    ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ

    है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ

     

    जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा

    कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ

     

    क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं ‘असद’

    है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ

    दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है

    इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है

     

    मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से

    बाल-ए-तदरौ जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है

     

    ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का

    ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है

     

    जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत

    ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है

     

    नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का

    जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है

     

    मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ

    माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है

     

    गुज़रा ‘असद’ मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यार से

    क़ासिद पे मुझ को रश्क-ए-सवाल-ओ-जवाब है

     

    ज़ाहिर है तर्ज़-ए-क़ैद से सय्याद की ग़रज़

    जो दाना दाम में है सो अश्क-ए-कबाब है

     

    बे-चश्म-ए-दिल न कर हवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार

    या’नी ये हर वरक़ वरक़-ए-इंतिख़ाब है

    रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

    ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

     

    हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में

    गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें जिसे

     

    फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

    अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे

     

    सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए

    वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे

     

    है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ

    शौक़-ए-इनाँ गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे

     

    दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-ऐश को

    सुब्ह-ए-बहार पुम्बा-ए-मीना कहें जिसे

     

    ‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइ’ज़ बुरा कहे

    ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

     

    या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो

    ये महशर-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे

     

    है इंतिज़ार से शरर आबाद रुस्तख़ेज़

    मिज़्गान-ए-कोह-कन रग-ए-ख़ारा कहें जिसे

     

    किस फ़ुर्सत-ए-विसाल पे है गुल को अंदलीब

    ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ ख़ंदा-ए-बे-जा कहें जिसे

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब

    धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब

    धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब

    धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव

    रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव

     

    दी सादगी से जान पड़ूँ कोहकन के पाँव

    हैहात क्यूँ न टूट गए पीर-ज़न के पाँव

     

    भागे थे हम बहुत सो उसी की सज़ा है ये

    हो कर असीर दाबते हैं राहज़न के पाँव

     

    मरहम की जुस्तुजू में फिरा हूँ जो दूर दूर

    तन से सिवा फ़िगार हैं इस ख़स्ता-तन के पाँव

     

    अल्लाह-रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बा’द-ए-मर्ग

    हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफ़न के पाँव

     

    है जोश-ए-गुल बहार में याँ तक कि हर तरफ़

    उड़ते हुए उलझते हैं मुर्ग़-ए-चमन के पाँव

     

    शब को किसी के ख़्वाब में आया न हो कहीं

    दुखते हैं आज उस बुत-ए-नाज़ुक-बदन के पाँव

     

    ‘ग़ालिब’ मिरे कलाम में क्यूँकर मज़ा न हो

    पीता हूँ धोके ख़ुसरव-ए-शीरीं-सुख़न के पाँव

     

    धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

     

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

    ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

     

    हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में

    गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें जिसे

     

    फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

    अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे

     

    सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए

    वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे

     

    है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ

    शौक़-ए-इनाँ गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे

     

    दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-ऐश को

    सुब्ह-ए-बहार पुम्बा-ए-मीना कहें जिसे

     

    ‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइ’ज़ बुरा कहे

    ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

     

    या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो

    ये महशर-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे

     

    है इंतिज़ार से शरर आबाद रुस्तख़ेज़

    मिज़्गान-ए-कोह-कन रग-ए-ख़ारा कहें जिसे

     

    किस फ़ुर्सत-ए-विसाल पे है गुल को अंदलीब

    ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ ख़ंदा-ए-बे-जा कहें जिसे

     

    आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे | मिर्ज़ा ग़ालिब

    याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे | मिर्ज़ा ग़ालिब

     

    याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे

    सुब्हा-ए-ज़ाहिद हुआ है ख़ंदा ज़ेर-ए-लब मुझे

     

    है कुशाद-ए-ख़ातिर-ए-वा-बस्ता दर रहन-ए-सुख़न

    था तिलिस्म-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद ख़ाना-ए-मकतब मुझे

     

    या रब इस आशुफ़्तगी की दाद किस से चाहिए

    रश्क आसाइश पे है ज़िंदानियों की अब मुझे

     

    तब्अ’ है मुश्ताक़-ए-लज़्ज़त-हा-ए-हसरत क्या करूँ

    आरज़ू से है शिकस्त-ए-आरज़ू मतलब मुझे

     

    दिल लगा कर आप भी ‘ग़ालिब’ मुझी से हो गए

    इश्क़ से आते थे माने मीरज़ा साहब मुझे

     

    याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले |  मिर्ज़ा ग़ालिब

    लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब

    लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब

     

    लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले

    ‘ग़ालिब’ ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ

     

    ख़ुश वहशते कि अर्ज़-ए-जुनून-ए-फ़ना करूँ

    जूँ गर्द-ए-राह जामा-ए-हस्ती क़बा करूँ

     

    आ ऐ बहार-ए-नाज़ कि तेरे ख़िराम से

    दस्तार गर्द-ए-शाख़-ए-गुल-ए-नक़्श-ए-पा करूँ

     

    ख़ुश ऊफ़्तादगी कि ब-सहरा-ए-इन्तिज़ार

    जूँ जादा गर्द-ए-रह से निगह सुर्मा-सा करूँ

     

    सब्र और ये अदा कि दिल आवे असीर-ए-चाक

    दर्द और ये कमीं कि रह-ए-नाला वा करूँ

     

    वो बे-दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-इक़बाल हूँ कि मैं

    वहशत ब-दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा करूँ

     

    वो इल्तिमास-ए-लज्ज़त-ए-बे-दाद हूँ कि मैं

    तेग़-ए-सितम को पुश्त-ए-ख़म-ए-इल्तिजा करूँ

     

    वो राज़-ए-नाला हूँ कि ब-शरह-ए-निगाह-ए-इज्ज़

    अफ़्शाँ ग़ुबार-ए-सुर्मा से फ़र्द-ए-सदा करूँ

     

    लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

    वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं

     

    तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं

    दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते है

     

    तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं

    ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं

     

    ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम

    कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं

     

    ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार

    सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं

     

    मुआफ़-ए-बे-हुदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़

    दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं

     

    ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त

    हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं

     

    अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत

    ज़बान-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं

     

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर | मिर्ज़ा ग़ालिब

     

    फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर

    है दाग़-ए-इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़

     

    है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर

    हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़

     

    मै-ख़ाना-ए-जिगर में यहाँ ख़ाक भी नहीं

    ख़म्याज़ा खींचे है बुत-ए-बे-दाद-फ़न हुनूज़

     

    जूँ जादा सर-ब-कू-ए-तमन्ना-ए-बे-दिली

    ज़ंजीर-ए-पा है रिश्ता-ए-हुब्बुल-वतन हुनूज़

     

    फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर | मिर्ज़ा ग़ालिब