ज़हर को दूध समझ कर कैसे पिया जाये
दिल हो अगर ज़ख़्मी तो उसे कैसे सिया जाये

ज़हर को दूध समझ कर कैसे पिया जाये
दिल हो अगर ज़ख़्मी तो उसे कैसे सिया जाये

जब खुद पर ही यकीन नहीं रहा मुझे
तो तुझ पर यकीन अब कैसे किया जाये

ज़िन्दगी है मेरी बदहाल न जाने कब से
बदहाल हुई ज़िदंगी को अब कैसे जिया जाये

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